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mahabharat 3.84.107-108h: हे भरतनन्दन! मणिनाग का तीर्थ प्रसाद (नैवेद्य, चरणामृत आदि) ग्रहण करने वाले मनुष्य को यदि सर्प भी काट ले, तो भी उस पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वहाँ एक रात निवास करने से एक हजार गौदान का फल मिलता है। 107 1/2।   |   mahabharat अध्याय 3.84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 107-108h
 
 
श्लोक  3.84.107-108h 
तैर्थिकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य भारत।
दष्टस्याशीविषेणापि न तस्य क्रमते विषम्॥ १०७॥
तत्रोष्य जननीमेकां गोसहस्रफलं लभेत्।
 
 
अनुवाद
हे भरतनन्दन! मणिनाग का तीर्थ प्रसाद (नैवेद्य, चरणामृत आदि) ग्रहण करने वाले मनुष्य को यदि सर्प भी काट ले, तो भी उस पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वहाँ एक रात निवास करने से एक हजार गौदान का फल मिलता है। 107 1/2।
 
O Bharatanandan! Even if a person who consumes the Tirtha Prasadam of Maninaga (Naivedya, Charanamrit etc.) is bitten by a snake, it does not have any effect on him. Staying there for one night gives the reward of donating a thousand cows. 107 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)