श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  3.83.70 
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् वै दैवतानि च।
उषित्वा रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत्॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ स्नान करके देवताओं और पितरों का पूजन करने तथा वहाँ रात्रि निवास करने से अग्निष्टोमय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। 70.
 
By bathing there and worshipping the gods and forefathers and staying there for a night one gets the fruits of an Agnishtomaya Yajna. 70.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)