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mahabharat 3.83.67-69: राजन! मानुष तीर्थ से एक कोस पूर्व की ओर आपगा नामक नदी है, जिसकी सेवा सिद्ध पुरुष करते हैं। जो व्यक्ति वहाँ देवताओं और पितरों को भोजन कराते हुए श्यामक (सावा) नामक अन्न का दान करता है, उसे महान धार्मिक फल की प्राप्ति होती है। वहाँ एक ब्राह्मण को भोजन कराने से एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल मिलता है। 67-69।   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 67-69
 
 
श्लोक  3.83.67-69 
मानुषस्य तु पूर्वेण क्रोशमात्रे महीपते॥ ६७॥
आपगा नाम विख्याता नदी सिद्धनिषेविता।
श्यामाकं भोजने तत्र य: प्रयच्छति मानव:॥ ६८॥
देवान् पितॄन् समुद्दिश्य तस्य धर्मफलं महत्।
एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
राजन! मानुष तीर्थ से एक कोस पूर्व की ओर आपगा नामक नदी है, जिसकी सेवा सिद्ध पुरुष करते हैं। जो व्यक्ति वहाँ देवताओं और पितरों को भोजन कराते हुए श्यामक (सावा) नामक अन्न का दान करता है, उसे महान धार्मिक फल की प्राप्ति होती है। वहाँ एक ब्राह्मण को भोजन कराने से एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल मिलता है। 67-69।
 
King! At a distance of one kos to the east of Manusha Tirtha, there is a river known as Aapaga, which is served by Siddha Purushas. The person who gives food called Shyamak (Sava) while serving food to the gods and ancestors there, gets great religious results. Feeding one Brahmin there gives the fruit of feeding one crore Brahmins. 67-69.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)