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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन
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श्लोक 51
श्लोक
3.83.51
शङ्खिनीतीर्थमासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह।
देव्यास्तीर्थे नर: स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम्॥ ५१॥
अनुवाद
कुरुश्रेष्ठ! पुरुष तीर्थयात्री शंखिनी तीर्थ में जाकर तथा वहाँ देवी तीर्थ में स्नान करके उत्तम गति को प्राप्त होता है।
Kurushrestha! A male pilgrim attains the best form by going to Shankhini Teerth and taking bath in the Devi Teerth there.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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