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mahabharat 3.83.48-49: जो मनुष्य अपने मन को वश में करके सूर्यतीर्थ में जाता है, स्नान करता है, देवताओं और पितरों का पूजन करता है और व्रत करता है, वह अग्निष्टोमयाग्य का फल प्राप्त करके सूर्यलोक को जाता है ॥48-49॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  3.83.48-49 
सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा नियतमानस:॥ ४८॥
अर्चयित्वा पितॄन् देवानुपवासपरायण:।
अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपने मन को वश में करके सूर्यतीर्थ में जाता है, स्नान करता है, देवताओं और पितरों का पूजन करता है और व्रत करता है, वह अग्निष्टोमयाग्य का फल प्राप्त करके सूर्यलोक को जाता है ॥48-49॥
 
A person who controls his mind, goes to Suryatirtha, takes bath and worships the gods and ancestors and fasts, gets the results of Agnistomayagya and goes to the world of the sun. 48-49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)