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mahabharat 3.83.2: ‘मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा।’ जो ऐसा सदैव कहता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥2॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.83.2 
कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्।
य एवं सततं ब्रूयात् सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा।’ जो ऐसा सदैव कहता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥2॥
 
'I will go to Kurukshetra, I will reside in Kurukshetra.' He who always says this becomes free from all sins. ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)