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mahabharat 3.83.175: तत्पश्चात पवित्र स्थान पर जाकर देवताओं और पितरों का तर्पण करे । जो मनुष्य ऐसा करता है, उसे अग्निष्टोमयाग का फल प्राप्त होता है ॥175॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 175
 
 
श्लोक  3.83.175 
पावनं तीर्थमासाद्य तर्पयेत् पितृदेवता:।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत॥ १७५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात पवित्र स्थान पर जाकर देवताओं और पितरों का तर्पण करे । जो मनुष्य ऐसा करता है, उसे अग्निष्टोमयाग का फल प्राप्त होता है ॥175॥
 
After that, go to the holy place and offer prayers to the gods and ancestors. India The man who does this gets the fruit of Agnishtomayagya. 175॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)