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mahabharat 3.83.168-169: नरेश्वर! उसके बाद तीर्थ की सेवा करने वाले मनुष्य को नारकीर्थ जाना चाहिए। राजन! उसमें स्नान करने से मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। महीपते! पुरुषसिंह! वहाँ स्वयं ब्रह्मा, नारायण आदि देवताओं के साथ प्रतिदिन निवास करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 168-169
 
 
श्लोक  3.83.168-169 
ततो गच्छेदनरकं तीर्थसेवी नराधिप।
तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुयात्॥ १६८॥
तत्र ब्रह्मा स्वयं नित्यं देवै: सह महीपते।
अन्वास्ते पुरुषव्याघ्र नारायणपुरोगमै:॥ १६९॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! उसके बाद तीर्थ की सेवा करने वाले मनुष्य को नारकीर्थ जाना चाहिए। राजन! उसमें स्नान करने से मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। महीपते! पुरुषसिंह! वहाँ स्वयं ब्रह्मा, नारायण आदि देवताओं के साथ प्रतिदिन निवास करते हैं।
 
Nareshwar! After that, the person serving the pilgrimage should go to Anarktirtha. Rajan! By bathing in it a person never falls into misery. Mahipate! Purusha Singh! Brahma himself resides there daily along with Narayan and other gods.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)