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mahabharat 3.83.166: जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन करता है, अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है और कुरु तीर्थ में स्नान करता है, वह सब पापों से शुद्ध होकर ब्रह्मलोक को जाता है॥166॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 166
 
 
श्लोक  3.83.166 
कुरुतीर्थे नर: स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते॥ १६६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन करता है, अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है और कुरु तीर्थ में स्नान करता है, वह सब पापों से शुद्ध होकर ब्रह्मलोक को जाता है॥166॥
 
A person who observes celibacy and controls his senses and takes a bath at the Kuru Tirtha, becomes pure from all sins and goes to Brahmaloka.॥ 166॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)