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mahabharat 3.83.164-165: वहाँ वरुणदेव से संबंधित तैजस नामक एक तीर्थ है, जो अपने तेज से प्रकाशित होता है। जहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपस्वी ऋषियों ने कार्तिकेय को देवसेनापति के पद पर अभिषिक्त किया था। कुरुश्रेष्ठ! तैजसतीर्थ के पूर्व भाग में कुरुतीर्थ है। 164-165॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 164-165
 
 
श्लोक  3.83.164-165 
तैजसं वारुणं तीर्थं दीप्यमानं स्वतेजसा।
यत्र ब्रह्मादिभिर्देवैर्ऋषिभिश्च तपोधनै:॥ १६४॥
सैनापत्येन देवानामभिषिक्तो गुहस्तदा।
तैजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह॥ १६५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ वरुणदेव से संबंधित तैजस नामक एक तीर्थ है, जो अपने तेज से प्रकाशित होता है। जहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपस्वी ऋषियों ने कार्तिकेय को देवसेनापति के पद पर अभिषिक्त किया था। कुरुश्रेष्ठ! तैजसतीर्थ के पूर्व भाग में कुरुतीर्थ है। 164-165॥
 
There is a shrine named Taijas related to the god Varuna, which illuminates with its brilliance. Where gods like Brahma and ascetic sages had anointed Kartikeya to the post of Devasenapati. Kurushrestha! Kurutirtha is in the eastern part of Taijasatirtha. 164-165॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)