श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  3.83.162 
तत: पञ्चवटीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:।
पुण्येन महता युक्त: सतां लोके महीयते॥ १६२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय पुरुष पंचवटी तीर्थ में जाकर महान पुण्यों को प्राप्त करके सत्पुरुषों के लोक में स्थित हो जाता है ॥162॥
 
Thereafter, a celibate and Jitendriya man, after going to Panchavati-tirtha and having great virtues, becomes established in the world of good men. 162॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)