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mahabharat 3.83.146: वह समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ है, जो पृथूदकतीर्थ में प्रार्थना करके शरीर त्याग करता है, उसे पुनः मृत्यु का भय नहीं रहता ॥146॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 146
 
 
श्लोक  3.83.146 
उत्तमं सर्वतीर्थानां यस्त्यजेदात्मनस्तनुम्।
पृथूदके जप्यपरो नैव श्वो मरणं तपेत्॥ १४६॥
 
 
अनुवाद
वह समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ है, जो पृथूदकतीर्थ में प्रार्थना करके शरीर त्याग करता है, उसे पुनः मृत्यु का भय नहीं रहता ॥146॥
 
He is the best among all the pilgrimages, the one who sacrifices his body by praying in Prithudakatirtha, he has no fear of re-death. 146॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)