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mahabharat 3.83.143-144: भारत! मनुष्य बुद्धि के द्वारा जाने-अनजाने में किसी भी स्त्री या पुरुष ने जो भी पाप किये हों, वे सब पृथूदक तीर्थ में स्नान करने मात्र से नष्ट हो जाते हैं और जो मनुष्य उस तीर्थ में जाता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है और वह स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥143-144॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 143-144
 
 
श्लोक  3.83.143-144 
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा।
यत् किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना॥ १४३॥
तत् सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत।
अश्वमेधफलं चास्य स्वर्गलोकं च गच्छति॥ १४४॥
 
 
अनुवाद
भारत! मनुष्य बुद्धि के द्वारा जाने-अनजाने में किसी भी स्त्री या पुरुष ने जो भी पाप किये हों, वे सब पृथूदक तीर्थ में स्नान करने मात्र से नष्ट हो जाते हैं और जो मनुष्य उस तीर्थ में जाता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है और वह स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥143-144॥
 
Bharat! Whatever sins a man or a woman has committed knowingly or unknowingly through human intellect, all of them are destroyed by simply taking a bath in the Prithudaka Tirtha and the person who visits the Tirtha gets the fruits of Ashwamedha Yagna and reaches heaven. ॥143-144॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)