श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 141-142
 
 
श्लोक  3.83.141-142 
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ १४१॥
पृथूदकमिति ख्यातं कार्तिकेयस्य वै नृप।
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रत:॥ १४२॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! तत्पश्चात कार्तिकेय के त्रिभुवन के प्रसिद्ध पृथुदकतीर्थ में जाकर वहाँ स्नान करो तथा देवताओं और पितरों का पूजन करो ॥141-142॥
 
Rajendra! Thereafter, visit the famous Prithudakattirtha of Kartikeya's Tribhuvan and take bath there and engage in the worship of gods and ancestors. 141-142॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)