Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.83.122-123h: ऋषि बोले - द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! मैं धर्म के मार्ग पर अडिग रहने वाला तपस्वी हूँ। यह शाक मेरे हाथ से रस चूस रहा है। क्या तुम इसे नहीं देखते? इसे देखकर मैं बड़े आनन्द से नाच रहा हूँ। 122 1/2॥ | mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ऋषिरुवाच
तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम।
किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम्॥ १२२॥
यं दृष्ट्वा सम्प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महतान्वित:।
अनुवाद
ऋषि बोले - द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! मैं धर्म के मार्ग पर अडिग रहने वाला तपस्वी हूँ। यह शाक मेरे हाथ से रस चूस रहा है। क्या तुम इसे नहीं देखते? इसे देखकर मैं बड़े आनन्द से नाच रहा हूँ। 122 1/2॥
The sage said – Dwijashreshtha! Brahman! I am an ascetic who remains steadfast on the path of religion. This vegetable is sucking the juice from my hand. Don't you see it? Seeing this I am dancing with great joy. 122 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥