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mahabharat 3.83.111: वह ऋषियों का स्थान है, जो उनके लिए अत्यंत संतोषप्रद है। उस उपवन में स्नान करने से मनुष्य अग्निष्टोमय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। 111.   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  3.83.111 
ऋषीणामवकाश: स्याद् यथा तुष्टिकरो महान्।
तस्मिन् कुञ्जे नर: स्नात्वा अग्निष्टोमफलं लभेत्॥ १११॥
 
 
अनुवाद
वह ऋषियों का स्थान है, जो उनके लिए अत्यंत संतोषप्रद है। उस उपवन में स्नान करने से मनुष्य अग्निष्टोमय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। 111.
 
That is the place of sages, which is very satisfying for them. By bathing in that grove, a man gets the fruits of Agnishtomaya Yajna. 111.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)