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mahabharat 3.83.105: हे व्याघ्र! उसके बाद पवनहार में स्नान करो। वह मरुभूमिवासियों के लिए उत्तम तीर्थ है। वहाँ स्नान करने से मनुष्य विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। 105॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  3.83.105 
पवनस्य ह्रदे स्नात्वा मरुतां तीर्थमुत्तमम्।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विष्णुलोके महीयते॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
हे व्याघ्र! उसके बाद पवनहार में स्नान करो। वह मरुभूमिवासियों के लिए उत्तम तीर्थ है। वहाँ स्नान करने से मनुष्य विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। 105॥
 
Tiger! After that take bath in Pawanhard. It is the best place of pilgrimage for the desert people. By taking bath there, a person gets established in Vishnuloka. 105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)