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mahabharat 3.82.58-59h: राजेन्द्र! उसके बाद उत्तम प्रभासतीर्थ में जाओ। हे प्रभु! उस तीर्थ में देवताओं के मुख के रूप में भगवान अग्निदेव, जिनका सारथि वायु है, सदैव निवास करते हैं। 58 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 58-59h
 
 
श्लोक  3.82.58-59h 
ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रभासं तीर्थमुत्तमम्।
तत्र संनिहितो नित्यं स्वयमेव हुताशन:॥ ५८॥
देवतानां मुखं वीर ज्वलनोऽनिलसारथि:।
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! उसके बाद उत्तम प्रभासतीर्थ में जाओ। हे प्रभु! उस तीर्थ में देवताओं के मुख के रूप में भगवान अग्निदेव, जिनका सारथि वायु है, सदैव निवास करते हैं। 58 1/2॥
 
Rajendra! After that go to Uttam Prabhastirtha. Daring! In that pilgrimage, Lord Agnidev, in the form of the face of the gods, whose charioteer is Vayu, always resides. 58 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)