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mahabharat 3.82.57: हे पुरुषश्रेष्ठ! पिंगतीर्थ में स्नान और आसन करने से ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय पुरुष सौ कपिल दान का फल प्राप्त करता है ॥57॥   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.82.57 
पिङ्गतीर्थमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:।
कपिलानां नरश्रेष्ठ शतस्य फलमश्नुते॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! पिंगतीर्थ में स्नान और आसन करने से ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय पुरुष सौ कपिल दान का फल प्राप्त करता है ॥57॥
 
Male best! By taking bath and asana in Pingtirtha, a celibate and Jitendriya person attains the fruit of the donation of a hundred Kapilas. 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)