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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.82.47 
अर्चयित्वा पितॄन् देवान्नियतो नियताशन:।
सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जो वहाँ संयमपूर्वक भोजन करते हुए देवताओं और पितरों का पूजन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं से किए गए यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥47॥
 
He who worships the gods and ancestors there, eating in moderation, obtains the fruits of a yajna performed with all desires. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)