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mahabharat 3.82.29: मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरों के दोषों को न देखते हुए, भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को वही शाक, फल और मूल दान करे जिनसे वह अपना जीवन निर्वाह करता है।   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.82.29 
शाकैर्मूलै: फलैर्वापि येन वर्तयते स्वयम्।
तद् वै दद्याद् ब्राह्मणाय श्रद्धावाननसूयक:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरों के दोषों को न देखते हुए, भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को वही शाक, फल और मूल दान करे जिनसे वह अपना जीवन निर्वाह करता है।
 
A man should donate to a Brahman with devotion the same vegetables, fruits and roots with which he sustains his life, without looking at the faults of others. 29.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)