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mahabharat 3.82.23: महाराज! वहाँ तपस्या करके देवता, दानव और ब्रह्मऋषि महान पुण्यों से युक्त होकर दिव्य योग से युक्त हो जाते हैं॥23॥   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.82.23 
यत्र देवास्तपस्तप्त्वा दैत्या ब्रह्मर्षयस्तथा।
दिव्ययोगा महाराज पुण्येन महतान्विता:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! वहाँ तपस्या करके देवता, दानव और ब्रह्मऋषि महान पुण्यों से युक्त होकर दिव्य योग से युक्त हो जाते हैं॥23॥
 
Maharaj! By doing penance there, the gods, demons and Brahmarishis become blessed with great virtues and become imbued with divine yoga. 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)