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mahabharat 3.82.19: तीर्थयात्रा करने से मनुष्य को जो लाभ मिलता है, वह अग्निष्टोम आदि यज्ञों को प्रचुर दक्षिणा सहित करने से भी नहीं मिल सकता ॥19॥   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.82.19 
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वा विपुलदक्षिणै:।
न तत् फलमवाप्नोति तीर्थाभिगमनेन यत्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
तीर्थयात्रा करने से मनुष्य को जो लाभ मिलता है, वह अग्निष्टोम आदि यज्ञों को प्रचुर दक्षिणा सहित करने से भी नहीं मिल सकता ॥19॥
 
The benefits that a man gets by going on a pilgrimage cannot be obtained even by performing yagnas like Agnishtom etc. with abundant dakshina.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)