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mahabharat 3.82.17: हे भरतश्रेष्ठ! यह ऋषियों का परम गोपनीय कर्म है। तीर्थयात्रा अत्यंत पवित्र और पुण्य कर्म है। यह यज्ञों से भी श्रेष्ठ है।   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.82.17 
ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम।
तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! यह ऋषियों का परम गोपनीय कर्म है। तीर्थयात्रा अत्यंत पवित्र और पुण्य कर्म है। यह यज्ञों से भी श्रेष्ठ है।
 
O best of the Bharatas! This is the most secret of the sages. Pilgrimage is a very sacred and virtuous deed. It is even better than the sacrifices.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)