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mahabharat 3.82.118-120: ऐसा करने से मनुष्य को दस हजार गौओं के दान का फल प्राप्त होता है तथा उसका वंश उन्नत होता है। हे धर्म के ज्ञाता! वहाँ से मन को एकाग्र करके रुद्रकोटितीर्थ जाओ। महाराज! रुद्रकोट वह स्थान है, जहाँ पूर्वकाल में एक करोड़ ऋषिगण भगवान रुद्र के दर्शन की इच्छा से बड़े हर्ष से भरकर आये थे। भरत! ‘मैं पहले भगवान वृषभध्वज का दर्शन करूँगा, उनका दर्शन करूँगा’, ऐसा निश्चय करके वे महामुनि वहाँ के लिए चले गए थे। 118-120।   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 118-120
 
 
श्लोक  3.82.118-120 
गवामयुतमाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत्।
ततो गच्छेत धर्मज्ञ रुद्रकोटिं समाहित:॥ ११८॥
पुरा यत्र महाराज मुनिकोटि: समागता।
हर्षेण महताविष्टा रुद्रदर्शनकाङ्क्षया॥ ११९॥
अहं पूर्वमहं पूर्वं द्रक्ष्यामि वृषभध्वजम्।
एवं सम्प्रस्थिता राजन्नृषय: किल भारत॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
ऐसा करने से मनुष्य को दस हजार गौओं के दान का फल प्राप्त होता है तथा उसका वंश उन्नत होता है। हे धर्म के ज्ञाता! वहाँ से मन को एकाग्र करके रुद्रकोटितीर्थ जाओ। महाराज! रुद्रकोट वह स्थान है, जहाँ पूर्वकाल में एक करोड़ ऋषिगण भगवान रुद्र के दर्शन की इच्छा से बड़े हर्ष से भरकर आये थे। भरत! ‘मैं पहले भगवान वृषभध्वज का दर्शन करूँगा, उनका दर्शन करूँगा’, ऐसा निश्चय करके वे महामुनि वहाँ के लिए चले गए थे। 118-120।
 
By doing this, a man attains the fruit of donating ten thousand cows and uplifts his lineage. Knower of Dharma! From there, concentrate your mind and go to Rudrakotitirth. Maharaj! Rudrakot is that place where in the past, one crore sages had come filled with great joy with the desire to have the darshan of Lord Rudra. Bharat! Having resolved, 'I will have the darshan of Lord Vrishabhadhwaj first, I will have the darshan', that great sage had left for there. 118-120.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)