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mahabharat 3.82.111: तत्पश्चात शौच और संतोष के नियमों का पालन करते हुए तथा नियमित आहार लेकर विनशंतीर्थ पर जाओ, जहां मेरे मुख पर निवास करने वाली सरस्वती अदृश्य रूप से प्रवाहित हो रही हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  3.82.111 
ततो विनशनं गच्छेन्नियतो नियताशन:।
गच्छत्यन्तर्हिता यत्र मेरुपृष्ठे सरस्वती॥ १११॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात शौच और संतोष के नियमों का पालन करते हुए तथा नियमित आहार लेकर विनशंतीर्थ पर जाओ, जहां मेरे मुख पर निवास करने वाली सरस्वती अदृश्य रूप से प्रवाहित हो रही हैं।
 
Thereafter, following the rules of defecation and satisfaction and taking regular food, go to Vinshantirtha, where Saraswati, who resides on my face, flows in an invisible manner.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)