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mahabharat 3.82.101: राजन! एकाग्र मन से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मणिमान तीर्थ में जाकर एक रात्रि निवास करो। इससे अग्निष्टोमयाग का फल प्राप्त होता है ॥101॥   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  3.82.101 
मणिमन्तं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहित:।
एकरात्रोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत्॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
राजन! एकाग्र मन से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मणिमान तीर्थ में जाकर एक रात्रि निवास करो। इससे अग्निष्टोमयाग का फल प्राप्त होता है ॥101॥
 
Rajan! With a concentrated mind, follow celibacy and go to Maniman Tirtha and stay there for one night. From this one gets the results of Agnistomayagya. 101॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)