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mahabharat 3.82.10: जो मनुष्य कामनाओं से दूर रहता है, जो कुछ उसके पास है, उसी में संतुष्ट रहता है और अहंकार से रहित है, वही तीर्थयात्रा का फल भोगता है ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 82: भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.82.10 
प्रतिग्रहादपावृत्त: संतुष्टो येन केनचित्।
अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य कामनाओं से दूर रहता है, जो कुछ उसके पास है, उसी में संतुष्ट रहता है और अहंकार से रहित है, वही तीर्थयात्रा का फल भोगता है ॥10॥
 
He who stays away from desires, is satisfied with whatever he has and is devoid of ego, he alone enjoys the fruits of pilgrimage. ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)