श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.81.4 
स तै: परिवृत: श्रीमान् भ्रातृभि: कुरुसत्तम:।
विबभावतिदीप्तौजा देवैरिव शतक्रतु:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अपने भाइयों से घिरे हुए परम तेजस्वी कौरव युधिष्ठिर देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के समान शोभा पा रहे थे॥4॥
 
Yudhishthira, the most brilliant Kurus, surrounded by his brothers, was looking as beautiful as Lord Indra surrounded by the gods. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)