श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.81.2 
अथापश्यन्महात्मानं देवर्षिं तत्र नारदम्।
दीप्यमानं श्रिया ब्राह्मॺा हुतार्चिषमिवानलम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
तभी उसने देखा कि महर्षि नारदजी वहाँ उपस्थित हैं, जो अपनी ब्रह्मतेज से प्रकाशित हो रहे हैं और घी की आहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे हैं॥ 2॥
 
Just then he saw that the great sage Narada was present there, radiant with his Brahman brilliance and shining like the fire ignited by the offering of ghee.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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