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mahabharat 3.81.19: शुद्ध एवं एकाग्र मन से उन्होंने (पुलस्त्य द्वारा अर्पित) हवि को अपने मस्तक पर धारण किया और महर्षि पुलस्त्य को इस प्रकार अपना नाम बताया -॥19॥   |   mahabharat अध्याय 3.81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.81.19 
शिरसा चार्घ्यमादाय शुचि: प्रयतमानस:।
नाम संकीर्तयामास तस्मिन् ब्रह्मर्षिसत्तमे॥ १९॥
 
 
अनुवाद
शुद्ध एवं एकाग्र मन से उन्होंने (पुलस्त्य द्वारा अर्पित) हवि को अपने मस्तक पर धारण किया और महर्षि पुलस्त्य को इस प्रकार अपना नाम बताया -॥19॥
 
With pure and concentrated mind, he held the offering (offered by Pulastya) on his head and introduced his name to the great sage Pulastya in this manner -॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)