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mahabharat 3.81.13-14: महाभाग! पूर्वकाल में देवताओं और गन्धर्वों से सेवित भागीरथी के पवित्र, मंगलमय तट पर, महाधर्मात्मा भीष्मजी पितृ व्रतों (श्राद्ध, तर्पण आदि) का आश्रय लेकर महर्षियों के साथ निवास करते थे।   |   mahabharat अध्याय 3.81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  3.81.13-14 
पुरा भागीरथीतीरे भीष्मो धर्मभृतां वर:।
पित्र्यं व्रतं समास्थाय न्यवसन्मुनिभि: सह॥ १३॥
शुभे देशे तथा राजन् पुण्ये देवर्षिसेविते।
गङ्गाद्वारे महाभाग देवगन्धर्वसेविते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
महाभाग! पूर्वकाल में देवताओं और गन्धर्वों से सेवित भागीरथी के पवित्र, मंगलमय तट पर, महाधर्मात्मा भीष्मजी पितृ व्रतों (श्राद्ध, तर्पण आदि) का आश्रय लेकर महर्षियों के साथ निवास करते थे।
 
Mahabhag! Earlier, in Gangadwar (Haridwar)-Teerth, the holy, auspicious banks of Bhagirathi, served by Gods and Gandharvas, the great religious soul Bhishmaji used to live with Maharishis, taking shelter of ancestral fasts (Shraddha, Tarpan etc.). 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)