श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.81.10 
यदि त्वहमनुग्राह्यो भ्रातृभि: सहितोऽनघ।
संदेहं मे मुनिश्रेष्ठ तत्त्वतश्छेत्तुमर्हसि॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप मुनि! यदि मैं अपने भाइयों सहित आपकी कृपा का पात्र बनूँ, तो कृपया मेरे संशय का उचित रीति से निवारण कीजिए। ॥10॥
 
"O sinless sage! If I, along with my brothers, become the recipient of your mercy, then please dispel my doubts in the proper manner." ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)