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mahabharat 3.81.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - 'हे जनमेजय! द्रौपदी तथा धनंजय के लिए आतुर समस्त भाइयों के मुख से उपर्युक्त वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर भी अत्यन्त दुःखी हुए।॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 81: युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.81.1 
वैशम्पायन उवाच
धनंजयोत्सुकानां तु भ्रातॄणां कृष्णया सह।
श्रुत्वा वाक्यानि विमना धर्मराजोऽप्यजायत॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'हे जनमेजय! द्रौपदी तथा धनंजय के लिए आतुर समस्त भाइयों के मुख से उपर्युक्त वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर भी अत्यन्त दुःखी हुए।॥1॥
 
Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! On hearing the above words from Draupadi and all the brothers who were eager for Dhananjaya, even Dharmaraja Yudhishthira became very sad. ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)