| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 80: अर्जुनके लिये द्रौपदीसहित पाण्डवोंकी चिन्ता » श्लोक 18-19 |
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| | | | श्लोक 3.80.18-19  | यस्य दीर्घौ समौ पीनौ भुजौ परिघसंनिभौ।
मौर्वीकृतकिणौ वृत्तौ खड्गायुधधनुर्धरौ॥ १८॥
निष्काङ्गदकृतापीडौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ।
तमृते पुरुषव्याघ्रं नष्टसूर्यमिवाम्बरम्॥ १९॥ | | | | | | अनुवाद | | जिनकी दोनों भुजाएँ लम्बी, मोटी, समान और परिघ के समान सुन्दर हैं, जिन पर धनुष-बाण की रगड़ के चिह्न हैं, जो गोलाकार हैं और जिनमें तलवार और धनुष सुशोभित हैं, जो पाँच-पाँच फनों वाले दो सर्पों के समान सुवर्णमय बाजूबंदों से सुशोभित हैं और जिनकी दोनों भुजाएँ पाँच-पाँच अँगुलियों वाली हैं, उन पुरुषोत्तम अर्जुन के बिना आज यह वन सूर्यरहित आकाश के समान सूना प्रतीत हो रहा है॥18-19॥ | | | | Without that best of men Arjuna, whose both arms are long, thick, equal and as beautiful as a Parigha, on which the marks of rubbing of the bow and arrow are left, which are circular and in which sword and bow are decorated, adorned with golden armlets which look like two serpents having five hoods each, and whose both arms have five fingers, today this forest appears as destitute as a sunless sky.॥ 18-19॥ | | ✨ ai-generated | | |
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