| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 80: अर्जुनके लिये द्रौपदीसहित पाण्डवोंकी चिन्ता » श्लोक 13-15 |
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| | | | श्लोक 3.80.13-15  | शून्यामिव प्रपश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम्।
बह्वाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम्॥ १३॥
न तथा रमणीयं वै तमृते सव्यसाचिनम्।
नीलाम्बुदसमप्रख्यं मत्तमातङ्गगामिनम्॥ १४॥
तमृते पुण्डरीकाक्षं काम्यकं नातिभाति मे।
यस्य वा धनुषो घोष: श्रूयते चाशनिस्वन:।
न लभे शर्म वै राजन् स्मरन्ती सव्यसाचिनम्॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | 'मैं इस स्थान को जहाँ कहीं भी देखता हूँ, मुझे यह सूना ही लगता है। अनेक आश्चर्यों से युक्त और पुष्पों से सुशोभित यह काम्यक वन, सव्यसाची अर्जुन के बिना पहले जैसा सुन्दर नहीं लगता। नीले मेघ के समान कान्ति वाले और मतवाले हाथी के समान वेग वाले अर्जुन के बिना मुझे यह काम्यक वन बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। हे राजन! जिनके धनुष की टंकार बिजली की गड़गड़ाहट के समान होती है, उन सव्यसाची का स्मरण करके मुझे शान्ति नहीं मिलती।'॥13-15॥ | | | | 'Wherever I look at this place, I find it desolate. This Kamyak forest, full of many wonders and adorned with blooming flowers, does not seem as beautiful as before without Savyasachi Arjuna. I do not like this Kamyak forest at all without Arjuna, who has the radiance of a blue cloud and whose speed is like that of a drunken elephant. O King! I do not get any peace remembering Savyasachi, whose bow's twang sounds like the thunder of lightning.'॥ 13-15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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