Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.8.11-12: परंतु महाराज! जन्म के समय वस्तु का जो स्वभाव होता है, वह नहीं जाता। चाहे वह वस्तु अमृत ही क्यों न हो। ऐसा मैंने सुना है। अथवा इस विषय में भीष्म, द्रोण, विदुर अथवा आपकी क्या राय है? यहाँ जो भी उचित हो, वही कार्य पहले करना चाहिए, तभी आपका उद्देश्य सिद्ध हो सकता है। ॥11-12॥ | mahabharat अध्याय 3.8: व्यासजीका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके अन्यायको रोकनेके लिये अनुरोध । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते।
श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति॥ ११॥
कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा।
भवान् वात्र क्षमं कार्यं पुरा वोऽर्थोऽभिवर्धते॥ १२॥
अनुवाद
परंतु महाराज! जन्म के समय वस्तु का जो स्वभाव होता है, वह नहीं जाता। चाहे वह वस्तु अमृत ही क्यों न हो। ऐसा मैंने सुना है। अथवा इस विषय में भीष्म, द्रोण, विदुर अथवा आपकी क्या राय है? यहाँ जो भी उचित हो, वही कार्य पहले करना चाहिए, तभी आपका उद्देश्य सिद्ध हो सकता है। ॥11-12॥
But Maharaj! The nature of a thing at the time of its birth does not go away. Even if that thing is Amrit (nectar). I have heard this. Or what is the opinion of Bhishma, Drona, Vidura or you in this matter? Whatever is appropriate here, that work should be done first, only then your purpose can be achieved. ॥ 11-12॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टमोऽध्याय:॥ ८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें व्यासवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥