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श्लोक 3.79.d4-d5h  |
तस्याक्षहृदयज्ञानमाख्यास्यामि कदा न्वहम्।
स हि श्रुत्वाक्षहृदयं समुपात्तं मया विभो॥
प्रहृष्ट: पुरुषव्याघ्रो भविष्यति न संशय:।) |
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| अनुवाद |
| मैं उसे अक्षहृदय (जुए का रहस्य) कब सिखाऊँगा? भीम! इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे द्वारा प्राप्त अक्षहृदय को सुनकर नरसिंह अर्जुन अत्यंत प्रसन्न होंगे। |
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| When will I teach him the secret of Akshahridaya (the secret of gambling). Bheema! There is no doubt that the lion of men Arjuna will be very happy to hear about the Akshahridaya that I have acquired. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि बृहदश्वगमने एकोनाशीतितमोऽध्याय:॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें बृहदश्वगमनविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं) |
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