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mahabharat 3.79.25: 'कुंतीकुमार धनंजय जिस प्रकार नियम और व्रतों का पालन करते हुए तपस्या में लीन हैं, वह अद्भुत है। वे मौन रहते हैं और एकाकी विचरण करते हैं। श्रीमान् अर्जुन तो धर्म के साक्षात् स्वरूप प्रतीत होते हैं।'   |   mahabharat अध्याय 3.79: राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्व मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताकर जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 79: राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्व मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताकर जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.79.25 
यथा धनंजय: पार्थस्तपस्वी नियतव्रत:।
मुनिरेकचर: श्रीमान् धर्मो विग्रहवानिव॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'कुंतीकुमार धनंजय जिस प्रकार नियम और व्रतों का पालन करते हुए तपस्या में लीन हैं, वह अद्भुत है। वे मौन रहते हैं और एकाकी विचरण करते हैं। श्रीमान् अर्जुन तो धर्म के साक्षात् स्वरूप प्रतीत होते हैं।'
 
'The way Kuntikumar Dhananjay is involved in penance by following rules and vows is amazing. He lives in silence and moves about alone. Shriman Arjun seems to be the embodiment of religion.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)