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श्लोक 3.78.33  |
ऊचु: प्राञ्जलय: सर्वे सामात्यप्रमुखा जना:।
अद्य स्म निर्वृता राजन् पुरे जनपदेऽपि च।
उपासितुं पुन: प्राप्ता देवा इव शतक्रतुम्॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| सब मन्त्रियों आदि ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज! आज हम नगर और जनपद के निवासी संतोष की साँस ले सकते हैं। जैसे देवतागण देवराज इन्द्र की सेवा में उपस्थित रहते हैं, उसी प्रकार हमें पुनः आपकी पूजा करने और आपके समीप बैठने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है।" ॥33॥ |
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| All the ministers and others folded their hands and said, "Maharaj! Today we, the residents of the city and the district, can breathe with satisfaction. Just as the gods are present in the service of the king of gods Indra, in the same way we have again got the auspicious opportunity to worship you and sit near you." ॥ 33॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि पुष्करपराभवपूर्वकं राज्यप्रत्यानयने अष्टसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें पुष्करको हराकर राजा नलके अपने नगरमें आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७८॥
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