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श्लोक 3.78.25  |
सौहार्दं चापि मे त्वत्तो न कदाचित् प्रहास्यति।
पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरद: शतम्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| 'तुम्हारे प्रति जो स्नेह है, वह मेरे हृदय से कभी नहीं जाएगा। पुष्कर! तुम मेरे भाई हो, जाओ और सौ वर्ष तक जीवित रहो।'॥25॥ |
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| 'The affection I have for you will never leave my heart. Pushkar! You are my brother, go and live for a hundred years.'॥ 25॥ |
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