श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 78: राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.78.25 
सौहार्दं चापि मे त्वत्तो न कदाचित् प्रहास्यति।
पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरद: शतम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारे प्रति जो स्नेह है, वह मेरे हृदय से कभी नहीं जाएगा। पुष्कर! तुम मेरे भाई हो, जाओ और सौ वर्ष तक जीवित रहो।'॥25॥
 
'The affection I have for you will never leave my heart. Pushkar! You are my brother, go and live for a hundred years.'॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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