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mahabharat 3.78.15-16h: 'मैं शत्रुओं के साथ जुआ खेलकर कभी संतुष्ट नहीं होता। आज मैं उस अत्यन्त सुन्दरी और उत्तम अंगों वाली दमयन्ती को जीतकर संतुष्ट होऊँगा, क्योंकि वह सदैव मेरे हृदय में निवास करती है।'॥15 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.78: राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 78: राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  3.78.15-16h 
देवनेन मम प्रीतिर्न भवत्यसुहृद्‍गणै:।
जित्वा त्वद्य वरारोहां दमयन्तीमनिन्दिताम्॥ १५॥
कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हृदि।
 
 
अनुवाद
'मैं शत्रुओं के साथ जुआ खेलकर कभी संतुष्ट नहीं होता। आज मैं उस अत्यन्त सुन्दरी और उत्तम अंगों वाली दमयन्ती को जीतकर संतुष्ट होऊँगा, क्योंकि वह सदैव मेरे हृदय में निवास करती है।'॥15 1/2॥
 
'I am never satisfied by gambling with my enemies. Today I will be satisfied by winning Damayanti who is extremely beautiful and has excellent limbs because she always resides in my heart.'॥ 15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)