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श्लोक 3.78.13-14  |
दिष्टॺा च ध्रियसे राजन् सदारोऽद्य महाभुज।
धनेनानेन वै भैमी जितेन समलंकृता॥ १३॥
मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सरा:।
नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैषध॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| 'राजा महाबाहु! सौभाग्यवश आप अपनी पत्नी सहित अभी जीवित हैं। इस धन को पाकर दमयन्ती अवश्य ही सज-धजकर मेरी सेवा में आएगी, जैसे स्वर्ग की अप्सराएँ देवराज इन्द्र की सेवा में जाती हैं। नैषध! मैं प्रतिदिन आपका स्मरण करती हूँ और आपकी प्रतीक्षा भी करती हूँ।॥13-14॥ |
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| ‘King Mahabahu! Fortunately you are still alive along with your wife. After winning this wealth Damayanti will definitely dress up and come to serve me, just like the Apsaras of heaven go to serve Devraj Indra. Naishadha! I remember you every day and also wait for you.॥ 13-14॥ |
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