श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 78: राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.78.12 
दिष्टॺा त्वयार्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध।
दिष्टॺा च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्या: क्षयं गतम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
नैषध! यह सौभाग्य की बात है कि तुमने दाव पर लगाने लायक धन कमाया है। यह भी आनन्द की बात है कि दमयन्ती के पाप नष्ट हो गए हैं॥12॥
 
‘Naishadha! It is a matter of good fortune that you have earned the money to bet on. It is also a matter of joy that Damayanti's misdeeds have been destroyed.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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