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श्लोक 3.78.12  |
दिष्टॺा त्वयार्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध।
दिष्टॺा च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्या: क्षयं गतम्॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| नैषध! यह सौभाग्य की बात है कि तुमने दाव पर लगाने लायक धन कमाया है। यह भी आनन्द की बात है कि दमयन्ती के पाप नष्ट हो गए हैं॥12॥ |
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| ‘Naishadha! It is a matter of good fortune that you have earned the money to bet on. It is also a matter of joy that Damayanti's misdeeds have been destroyed.॥ 12॥ |
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