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mahabharat 3.77.17: आपकी अश्वविद्या मेरे पास धरोहर के रूप में पड़ी है। हे राजन! यदि आप इसे उचित समझें, तो मैं इसे आपको दे सकता हूँ। ऐसा कहकर निषादराज नल ने ऋतुपर्ण को अश्वविद्या प्रदान की।   |   mahabharat अध्याय 3.77: नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 77: नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.77.17 
इदं चैव हयज्ञानं त्वदीयं मयि तिष्ठति।
तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव।
एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णाय नैषध:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
आपकी अश्वविद्या मेरे पास धरोहर के रूप में पड़ी है। हे राजन! यदि आप इसे उचित समझें, तो मैं इसे आपको दे सकता हूँ। ऐसा कहकर निषादराज नल ने ऋतुपर्ण को अश्वविद्या प्रदान की।
 
Your horse science is lying with me as a heritage. O King! If you deem it fit, I wish to give it to you. Saying this, Nishadraj Nala imparted horse science to Rituparna. 17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)