श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 77: नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.77.16 
सर्वकामै: सुविहितै: सुखमस्म्युषितस्त्वयि।
न तथा स्वगृहे राजन् यथा तव गृहे सदा॥ १६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! वहाँ मेरी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हुईं और इसी कारण मैं यहाँ सदैव सुखी रहा। महाराज! आपके महल में मुझे जो सुख मिला, वह मुझे अपने घर में भी नहीं मिला॥16॥
 
King! All my wishes were fulfilled there and because of this I was always happy here. Maharaj! I did not get the kind of comfort I got in your palace even in my own house.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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