श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 77: नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.77.15 
पूर्वं ह्यपि सखा मेऽसि सम्बन्धी च जनाधिप।
अत ऊर्ध्वं तु भूयस्त्वं प्रीतिमाहर्तुमर्हसि॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे ज्ञानेश्वर! आप पहले भी मेरे मित्र और सम्बन्धी थे और इसके बाद भी आपको मुझ पर अधिकाधिक प्रेम रखना चाहिए॥ 15॥
 
O Jnaneshwar! You were my friend and relative even before and even after this you should have maximum love for me.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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