श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 77: नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.77.12 
किंचित् तु नापराधं ते कृतवानस्मि नैषध।
अज्ञातवासे वसतो मद्‍गृहे वसुधाधिप॥ १२॥
 
 
अनुवाद
(फिर उसने कहा -) 'नैषध! हे राजन! वनवास के समय जब आप मेरे घर में रह रहे थे, तब क्या मैंने आपका कोई अपराध किया था?॥12॥
 
(And again he said -) 'Naishadha! O king! When you were living in my house during your exile, did I commit any crime against you?॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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