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श्लोक 3.77.11  |
| दिष्टॺा समेतो दारै: स्वैर्भवानित्यभ्यनन्दत॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| ‘निषधननरेश! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हें अपनी खोई हुई पत्नी मिल गई।’ ऐसा कहकर उन्होंने नल को नमस्कार किया। |
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| 'Nishadhanaresh! It is a matter of great fortune that you have met your lost wife.' Saying this he greeted Nala. |
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