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mahabharat 3.76.30: हे मनुष्यों के स्वामी! हे पृथ्वी के स्वामी! मैं भली-भाँति जानता हूँ कि इस संसार में आपके अतिरिक्त कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है जो घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार होकर एक दिन में सौ योजन की यात्रा कर सके।   |   mahabharat अध्याय 3.76: दमयन्ती और बाहुककी बातचीत, नलका प्राकटॺ और नल-दमयन्ती-मिलन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.76.30 
त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते।
समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! हे पृथ्वी के स्वामी! मैं भली-भाँति जानता हूँ कि इस संसार में आपके अतिरिक्त कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है जो घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार होकर एक दिन में सौ योजन की यात्रा कर सके।
 
Lord of men! Lord of the earth! I know very well that in this world there is no other person except you who is capable of travelling a distance of hundred yojanas in a single day riding a chariot drawn by horses.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)